Wednesday, January 7, 2009

अरबों खर्च,लेकिन नहीं मिटी गरीबी!


07 अक्टूबर 2008 वार्तानई दिल्ली। देश में सरकार अरबों रुपए खर्च करने के बाद भी गरीबी मिटा नहीं पाई है। गरीबी को मिटाने के लिए आजादी के बाद से अब तक 61 वर्षों में सरकार ने कम से कम 35 बड़ी एवं महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू की और उस पर अरबों रुपए खर्च किए, लेकिन गरीबी घटने की बजाय बढ़ती जा रही है।इतना ही नहीं इन विषमताओं ने आतंकवाद, नक्सलवाद और साम्प्रदायिकता जैसी समस्याओं के लिए आग में घी का काम किया है।जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में गत दिनों ‘विकट गरीबी’ पर तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर से आए विशेषज्ञों ने अपने पर्चों में यह राय जाहिर की।विश्वविद्यालय द्वारा सम्मेलन के मौके पर प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गरीबी को दूर करने के लिए पहली महत्वपूर्ण योजना ‘सामुदायिक विकास कार्यक्रम’ शुरू किया था, उसके बाद से लेकर अब तक 35 महत्वपूर्ण एवं बड़ी परियोजनाएं शुरू की गई हैं।

देश की तिहाई आबादी जीती है12 रु. प्रतिदिन पर

28 फरवरी 2008 वार्तानयी दिल्ली। एक ओर जहां देश की अर्थव्यवस्था करीब नौ प्रतिशत की तेज रफ्तार से आगे बढ रही है वहीं देश की करीब एक तिहाई आबादी प्रतिदिन 12 रूपये पर गुजारा करने को मजबूर है तथा करीब दो प्रतिशत परिवारों को भूखे पेट सोना पडता है।

करोड़ों भारतीयों का खर्च मात्र 20 रुपए रोज

29 अगस्त 2007सीएनएन-आईबीएनरुपश्री नंदा नई दिल्ली। असंगठित क्षेत्र में कार्य और आजीविका की स्थिति पर अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट के आधार पर इस बात का खुलासा हुआ है कि 83 करोड़ 60 लाख भारतीय प्रतिदिन केवल 20 रुपए पर अपना गुजारा करते हैं। यह रिपोर्ट 1993-94 और 2004-05 के बीच लिए गए सरकारी आंकड़ों पर आधारित है। यह संख्या भले ही धीमी गति से 10 करोड़ के पार पहुंची है, वहीं दूसरी ओर अमीरों की भी संख्या बढ़कर 9 करोड़ 30 लाख हो गई। असंगठित क्षेत्र के उद्यमों पर गठित राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष अर्जुन सेनगुप्ता का दावा है कि यह सर्वेक्षण वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। गरीबी को आंकने वाले अन्य अनुमान केवल गरीबों को मद्देनजर रखते हुए बनाए जाते हैं, लेकिन हम गरीबों की अलग-अलग श्रेणियों को ध्यान में रखते हैं। तब देश की अर्थव्यवस्था में तेजी से आखिर किसे लाभ हुआ है? मध्यम वर्गीय और अमीरों की संख्या जहां 16 करोड़ 20 लाख से बढ़कर 25 करोड़ 30 लाख हो गई है वहीं उच्‍च मध्यमवर्गीय लोगों की संख्या बढ़कर 9 करोड़ 10 लाख हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार अत्यंत गरीब लोगों की संख्या 27 करोड़ 40 लाख से घटकर 23 करोड़ 70 लाख हो गई है। उनका प्रति व्यक्ति उपभोग भी 9 से बढ़कर 12 रुपए हो गया है। सेनगुप्ता का कहना है कि अमीर अक्सर अपना उपभोग छुपाते हैं। इसलिए अगर आप देखें तो ये अमीर रिपोर्ट में बताई गई जानकारी से काफी ज्यादा अमीर हैं। इससे यह साबित होता है कि गरीबों और अमीरों के बीच का फासला और गहरा हो गया है। प्रतिदिन 9 रुपए से कम कमाने वाले लोगों को अत्यंत गरीब माना जाता है। लेकिन 13 रुपए प्रतिदिन कमाने वाले को गरीबी रेखा से ऊपर रखा जाता है, इसलिए गरीबी की परिभाषा को समझना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है। माना जा रहा था कि आर्थिक सुधारों से परिस्थियां बदलेंगी, लेकिन ये उपाय नाकाफी साबित हुए हैं, क्योंकि विषम स्थिति में जीने वाले लोगों के जीवन में कोई बदलाव नहीं आया है। शायद यही कारण है कि आर्थिक सुधार के पक्षधर नेताओं को जनता के वोट नहीं मिल पाते।

जन्म से पहले न मरें लड़िकयां...

17 मई 2008इंडो-एशियन न्यूज सर्विसनई दिल्ली। पूरी दुनिया में महिलाओं के साथ भेदभाव और दोयम दर्जे का बर्ताव तो होता है, लेकिन लड़कियों को उनके जन्म से ही पहले ही मारने की प्रवृत्ति केवल भारत में ही देखी जा सकती है। भारत में लड़कियों की घटती जन्म दर केवल प्राकृतिक संयोग नहीं है।
इसके लिए बच्चे के जन्म के पूर्व लिंग की जांच और मादा भ्रूणों की हत्या काफी हद तक जिम्मेदार है। सरकार द्वारा बच्चे के जन्म के पूर्व लिंग जांच पर रोक के बावजूद यह गोरखधंधा बेरोकटोक जारी है। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा जैसे संपन्न राज्यों में लड़कियों की घटती संख्या काफी चिंताजनक है। समाज में लड़कियों की घटती संख्या के खतरे के प्रति सावधान करने और उनकी संख्या बढ़ाने के लिए जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से ‘पापुलेशन फर्स्ट’ नामक स्वयंसेवी संस्था ने संयुक्त राष्ट्र पापुलेशन फंड (यूएनएफपी) के सहयोग से ‘लाडली’ अभियान चलाया है। ‘लाडली योजना’ का उद्देश्य समाज में लड़कियों की उपस्थिति के सकारात्मक पहलुओं का प्रचार करना है।
जनगणना के आंकड़ों से ऐसे संकेत मिले हैं कि आने वाले पांच वर्षों में भारत में हर साल करीब 50 लाख मादा भ्रूणों का गर्भपात कराया जाएगा। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए काफी प्रयास करने की जरूरत है। सदियों पुरानी नारी विरोधी मानसिकता को रोकने के लिए पापुलेशन फर्स्ट ‘लाडली’ नामक एक भावनात्मक प्रचार अभियान चला रही है।‘लाडली’ अभियान को सफल बनाने में समाचार माध्यम बहुत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। मीडिया की सकारात्मक भूमिका को प्रोत्साहित करने के लिए पापुलेशन फर्स्ट और यूएनएफपी ने ‘लाडली मीडिया पुरस्कार’ शुरू किए हैं। देश में लैंगिक समानता के लिए कार्य करने वाले मीडियाकर्मियों को पहली बार 2007 में लाडली मीडिया पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था।
इस वर्ष के मीडिया कर्मियों के साथ ही शाहरूख खान की फिल्म ‘चक दे..’ के निर्देशक शिमित अमीन को भी लाडली पुरस्कार दिया गया। ‘चक दे..’ के माध्यम से समाज में महिलाओं के दोयम दर्जे के हालात को बखूबी सामने रखा गया है।

पेडों की कटाई से कई प्रजातियों को खतरा

पेडों की बेलगाम कटाई पृथ्वी पर विभिन्न जानवरों और पक्षियों के अस्तित्व को संकट में डाल रही है। यदि पेडों की कटाई पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में हम बहुत से पशु-पक्षियों को देखने से वंचित हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन को लेकर वैश्विक सम्मेलन में भी चिंता जाहिर की गई है। हाल ही आयोजित यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के वैश्विक शिखर सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए सामूहिक कारगर कदम उठाए जाने पर जोर दिया गया। यदि इस समस्या से निपटने के लिए जरूरी संसाधन जुटा लिया गया तो संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के वल्र्ड कंजर्वेशन मॉनिटरिंग सेंटर (डब्ल्यूसीएमसी) द्वारा विकसित कार्बन एंड बायोडायवर्सिटी डेमंस्ट्रेशन एटलस पर अमल करने में आसानी होगी। संयुक्त राष्ट्र के अपर महासचिव और यूनेप के कार्यकारी निदेशक एकिम स्टीनर ने कहा, ""इस वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में एक-एक डालर या यूरो या फिर रूपए का इस्तेमाल इस तरह किया जाना चाहिए कि हमें पहले से दोगुना नतीजा मिले। यूनेप प्रवक्ता निक नुटल ने कहा कि शोध से हमें पता चला है कि जहां भी वनों का विनाश हो रहा है, वहां जलवायु परिवर्तन की समस्या के गहराने और जीव प्रजातियों का अस्तित्व मिटने का खतरा बढ रहा है।

भोपाल को प्रदूषण मुक्त बनाने की कोशिश!

भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने भोपाल को प्रदूषण मुक्त बनाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। राज्य सरकार ने अवैध बस संचालन, पॉलीथिन के इस्तेमाल और शहर के भीतर चल रही डेयरियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए समय निर्धारित कर एक कार्य योजना भी तैयार की है।भोपाल में मनमर्जी से चल रही अवैध बसों की मस्ती किसी से छुपी नहीं है। इसके अलावा पॉलीथिन का इस्तेमाल भी बदस्तूर जारी है और शहर के लगभग हर हिस्से में डेयरियों की भरमार है। इन स्थितियों से नगर निगम, पुलिस व परिवहन महकमा और प्रदूषण विभाग बखूबी वाकिफ है।
बिगड़ते हालातों के कारण स्थानीय नगरीय प्रशासन मंत्री बाबू लाल गौर ने जिम्मेदार अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे तय समय सीमा में इन समस्याओं से राजधानी को मुक्ति दिलाएं।गौर के मुताबिक अवैध रूप से चल रही बसों पर 24 घंटे में लगाम कस जानी चाहिए। इतना ही नहीं आवारा पशुओं की धरपकड़ का अभियान तेज कर उनके मालिकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।
ऐसा करने के लिए 15 दिन का समय तय किया गया है। इसी समय सीमा में शहर से डेयरियों को भी बाहर करना है। इसके अतिरिक्त पॉलीथिन के क्रय, विक्रय और इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए पहल के निर्देश जारी किए गए हैं।

प्रदूषण के लिए म.प्र. सरकार को नोटिस
24 सितम्बर 2008 वार्ता नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने किसानों की याचिका पर मध्यप्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। किसानों ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि उज्जैन स्थित ग्रासिम इंडस्ट्रीज से बड़ी मात्रा में अत्यंत नुकसानदेह रसायन निकलता है, जिससे इलाके की 28 हेक्टयर कृषि योग्य भूमि नष्ट हो गई है।मुख्य न्यायाधीश केजी. बालकृष्णन, न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम तथा न्यायमूर्ति जेएम. पांचाल की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील की दलील सुनने के बाद यह नोटिस सोमवार को जारी किया।वकील का कहना था कि इस कारखाने से बड़ी मात्रा में निकलने वाले रसायनों से इलाके की उपजाऊ जमीन बंजर होती जा रही है और पानी अम्लीय तथा पीने लायक नहीं रह गया है।याचिकाकर्ता मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की है, जिसमें उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी।किसानों ने इलाके के उपमंडलीय अधिकारी से 2005 में ही शिकायत की थी। उनका कहना है कि औद्योगिक प्रदूषण के चलते 28 हेक्टयर भूमि पर खड़ी फसल बर्बाद हो गई थी।

संक्रमण के शिकार!

जोधपुर । शहर के सरकारी अस्पतालों के ऑपरेशन थियेटर व ट्रोमा सेंटर में उपचार के समय चिकित्सक व वहां कार्यरत सहायक कर्मचारी खुद को संक्रमण से बचाने का पूरा जतन करते हैं। इसके उलट अस्पताल के गंदे एवं संक्रमित कपडे, गॉज व चादर की धुलाई करने वाले कार्मिकों के स्वास्थ्य की चिंता किसी को नहीं है। इसके चलते वे अनचाहे संक्रमण का शिकार हो रहे हैं। मामला डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज से जुडे अस्पतालों के धोबीघाट पर कार्यरत कर्मचारियों का है, जो पेट पालने की मजबूरी में रोजाना इस संक्रमण को झेल रहे हैं। दिलचस्प पहलु यह है कि सौ फीसदी संक्रमण क्षेत्र में कार्यरत इन कर्मचारियों को कोई जोखिम भत्ता देय नहीं है। मरीजों के खून एवं पस से सने कपडे धोने के लिए उन्हें दस्ताने तक उपलब्ध नहीं कराए जाते। साबुन, तेजाब एवं सोडे की क्वालिटी बेहद घटिया है। बदला नहीं तरीकामेडिकल कॉलेज से जुडे तीनों अस्पतालों में प्रतिदिन हजारों की तादात में कपडे धुलते हैं। लेकिन बरसों बाद भी यहां परम्परागत तरीका काम में लिया जा रहा है। मशीनें नहीं मिलने से आज भी यहां भट्टी में कपडों को उबाल कर धोया जाता है। नहीं होती स्वास्थ्य जांच संक्रमण से प्रभावित कार्यस्थलों को "हाई रिस्क" जोन माना गया है। यहां कार्यरत कार्मिकों की नियमानुसार साल में एक बार उच्च स्तरीय मेडिकल जांच होनी अनिवार्य है, लेकिन अस्पतालों में स्वास्थ्य परीक्षण की ऎसी कोई व्यवस्था नहीं है।नाम का तेजाब, घटिया सोडाजानकार कहते हैं कि यूं तो धोबीघाट पर कपडे धोने के लिए सोडा पाउडर, साबुन व तेजाब उपलब्ध होता है। वास्तव में तेजाब व सोडा पाउडर की क्वालिटी बेहद घटिया होती है। कपडों को देखकर इससे अंदाज लगाया जा सकता है। साबुन टिकिया ऎसी है कि ठीक से हाथ भी नहीं धोए जा सकते। इनका कहना है"धोबी घाट के कर्मचारियों को नियमानुसार सुविधाएं दी जाती है। जोखिम भत्ते के बारे में पता किया जाएगा।"-डॉ. डीआर माथुर, अधीक्षक, महात्मा गांधी अस्पताल"कर्मचारियों को जोखिम भत्ता नहीं मिलता है, इसके बारे में जानकारी ली जाएगी।"-डॉ. केके सबरवाल, अधीक्षक, एमडीएम अस्पताल"अस्पतालों के संक्रमित क्षेत्र में कार्यरत चुतर्थ श्रेणी कर्मचारियों को जोखिम भत्ता मिलना तो दूर उनका स्वास्थ्य परीक्षण तक नहीं होता। सरकार को समय-समय पर ज्ञापन देकर अवगत भी कराया गया, लेकिन ध्यान किसी ने नहीं दिया।"-नगाराम चौहान, जिलाध्यक्ष, राजस्थान सहायक कर्मचारी संघ (एकी



Tuesday, January 6, 2009