Tuesday, December 23, 2008

लखनऊ में इंडियन मीडिया सेण्टर फॉर जर्नलिस्ट्स के सहयोग से संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स पर आयोजित एक कार्यशाला

इस देश के तीन चौथाई लोगों की प्रतिदिन की आय बीस रुपये से भी कम है, ऐसा भारत सरकार के आंकड़े कहते हैं, यथार्थ इससे भी भयानक है।राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव के चलते केवल वादे किये जाते हैं, आर्थिक संसाधनों की तरफ ध्यान भी नहीं जाता. यह मानना है दलित संगठनो के राष्ट्रीय परिसंघ के मुखिया अशोक भारती का. श्री भारती इंडिया मीडिया सेण्टर फॉर जर्नलिस्ट्स, यू.एन.डी.पी. एवं वूमेन फीचर सर्विस द्वारा राजधानी के एक होटल में क्षेत्रीय मीडियाकर्मियों की कार्यशाला में बोल रहे थे. उन्होंने तमाम सरकारी विकास योजनाओं का हवाला देते हुए कहा कि इससे आम आदमी का भला उतना नहीं हुआ, जितना सोचा जा रहा था. सयुंक्त राष्ट्र के सहस्त्राब्दी लक्ष्य को लेकर उन्होंने कहा कि हमारा संविधान भी इन्ही सब बातो पर बल देता है. प्रशासनिक अमलों को दुरुस्त करना होगा ताकि लक्ष्य प्राप्त किये जा सकें. प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्त्ता संदीप पाण्डेय ने कहा कि जनसंख्या समस्या नहीं है, समस्या है संसाधनों के समान बँटवारे कि. उन्होंने प्रश्न उठाया कि एक व्यक्ति कही भूख से मरता है और एक कही बम से, बम से होने वाली मौत बड़ी खबर क्यों बन जाती है जबकि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि भूख से होने वाली मौत के लिए जिला अधिकारी सीधे जिम्मेदार है. इस स्थिति में गरीब को अनाज से वंचित करने वाले देशद्रोही ही कहे जायेंगे. उन्होंने कहा कि सूचना के अधिकार का प्रयोग करके बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है.
वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश के अनुसार जब तक लिखने का कौशल विकसित नहीं किया जायेगा तब तक अच्छी खबर नहीं बन सकती. छोटी खबर से हम व्यवस्था की बड़ी खामियों को उजागर कर सकते हैं. अभी भी इस देश में कई समुदाय,समूह ऐसे हैं जिनकी बात करने वाला भी कोई नहीं है. जहाँ व्यवस्था निरंकुश हो जाती है वहां अखबारों की भूमिका अहम् है. उन्होंने कहा की प्रेस रिलीज छापने से बेहतर है अछूते विषयों पर ध्यान दें. हमारी सीमाएं अनंत हैं, सूचना के अधिकार का अचूक इस्तेमाल करके पत्रकार तथ्यात्मक खबरें बना सकते हैं. विकास के मापदंड पर जो चीजें अधूरी हैं उनके बारे में सवाल पूछिए, छापने के बाद राजनैतिक आधार के लिए ही सही राजनैतिक दल सक्रिय होते ही हैं. इसलिए पत्रकार को अपनी भूमिका सबल रूप से रखनी ही होगी.वरिष्ठ पत्रकार नीलाभ मिश्र ने कहा की एक कहानी में कई कहानियाँ छिपी होती हैं, अतः जब लिखने बैठें तो खबर को उसकी तार्किक परिणति तक लें जाये. अपने अनुभवों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा की चेकलिस्ट बनाकर लिखने बैठा जाए तो खानी सरकार की योजना से जुड़ जाती है और कहानियां ही पत्रकारिता की जान होती है, आंकड़े नहीं.उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रमों से जुड़े आर.एस.माथुर के विचार में राजनीति के बजाय विकास से जुड़े मुद्दों पर अखबारों को ज्यादा ध्यान देना चाहिए. जितने अधिकार हैं मांगे जांए, मांग होगी तो सरकार भी सक्रिय होगी. उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि केरल में स्कूल बंद रहने पर जनता सड़क पर आ जाती है जबकि उत्तर प्रदेश में स्कूल बंद रहें या खुले कोई मतलब नहीं तो लोगो को खुद आगे आना पड़ेगा फिर समस्याएँ स्वतः हल हो जाएंगी. उन्होंने कहा कि नागरिक संगठनो के सशक्त होने से एक दबाव समूह का निर्माण होता है जिससे निति निर्माताओ पर असर पड़ता है. नर्मदा प्रोजेक्ट पर विश्व बैंक द्वारा ऋण देने से मना करने को उन्होंने जन आन्दोलन के दबाव का ही असर कहा. यूनिसेफ के आगस्टिन वालेथ, टी.बी. और लंग डिसीज के लिए कम करने वाले प्रणय लाल, यु.एन.दी.पि कि राधिका कौल बत्रा ने भी कार्यशाला में अपने विचार रखें. इसके पहले "लक्ष्यों से कहानियो तक, कहानियो से लक्ष्यों तक" की विषय वस्तु के साथ इस कार्यशाला में झारखण्ड,बिहार, उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश से आये मीडियाकर्मियों का स्वागत आई.एम्.सी.एफ.जे. के आशुतोष एवं विमेन फीचर सर्विस की पामेला फिलिपोस ने किया.

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